Tuesday, September 18, 2018

17> Lakshmibai THE Rani ofJhansi---–||


17>|-- Lakshmibai THE Rani of Jhansi---–||

( 19/11/1828 to 18/06/1858 )


Jhansi is in the north-central part of India

The state under Maratha Empire.

Lakshmibai the Rani ofJhansi

was an Indianqueen and warrior. And

was the queen of the princely state of Jhansi currently present in Jhansi district in Uttar Pradesh, India.


Birth name=Manikarnika Tambe or Manu.

Born=19 November 1828

Birthplace=Varanasi, India

Died=17/18 June 1858(aged 29)

Place of death=Kotah ki Serai, Gwalior, India

Father=Moropant Tambe

Mother=Bhagirathi Bai.

Manikarnika was born into a Maratha family at Varanasi.


Lakshmibai was one of the leading figures of the Indian Rebellion of 1857 and became a symbol of resistance to the British Raj East India Company in India.

She was married to Raja Gangadhar Rao Newalkar, the Maharaja of Jhansi, in 1842, and became the Rani of Jhansi.(She was married when she was 7 years old )

After her marriage Manikarnika became Lakshmibai, so named in honour of the goddess Lakshmi.

In 1851, Rani Lakshmibai had a son,

but the infant died at the age of about four months.

However the Raja could not recover from his bereavement on the lossফ of his child

And died on 21 November 1853. Then LKshmi Bai was eighteen .

On the day before the raja's death in November 1853, she adopted a son. His name was Anand, but was renamed Damodar, after their actual son. The raja wrote a letter to the British government of India requesting that his widow should be recognised as the ruler of Jhansi after his death during her lifetime. After the death of her husband the head of the British government of India, Lord Dalhousie, refused to allow her adopted son to become raja and Jhansi was then ruled by the British.

( The British East India Company, in its greed to annexe Indian Princely States, promulgated a rule known as the "Doctrine of Lapse".++++++++×********

After all the British in Jhansi had been killed by mutinous Indian troops in June 1857 the Rani took over the administration provisionally until the British returned. However she had to form an army to defeat the invading forces of Orchha and Datia and the British believed she had been responsible for the earlier British deaths.In March 1858, British forces led by Sir Hugh Rose came to Jhansi to take back the city from the Rani who now wanted independence. Jhansi was besieged and finally taken after strong resistance. Many of the people of the city were killed in the fighting and many more afterwards. The Rani escaped to Kalpi and jointly with the Maratha general Tantya Tope then seized Gwalior. In the battle of Kotah ki Serai in which their army was defeated Rani Lakshmibai was mortally wounded, 17th June 1858.

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रानी लक्ष्मी बाई (जन्म: 19 नवम्बर 1835 – मृत्यु: 17 जून 1858)

लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से सब उन्हें मनु कहकर पुकारते थे। मनु का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था तथा उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान एवं धार्मिक महिला थीं। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली। सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया।

1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की किन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।
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*महारानी लक्ष्मीबाई इतिहास*

पूरा नाम – राणी लक्ष्मीबाई गंगाधरराव.

जन्म – 19 नवम्बर, 1828.

जन्मस्थान – वाराणसी.

पिता – श्री. मोरोपन्त.

माता – भागीरथी

शिक्षा – मल्लविद्या, घुसडवारी और शत्रविद्याए सीखी.

विवाह – राजा गंगाधरराव के साथ.

लक्ष्मीबाई उर्फ़ झाँसी की रानी मराठा शासित राज्य झाँसी की रानी थी, जो उत्तर-मध्य भारत में स्थित है. रानी लक्ष्मीबाई 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थी जिन्होंने अल्पायु में ही ब्रिटिश साम्राज्य से संग्राम किया था.

लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नमक नगर में 19 नवम्बर 1828 में हुआ था. उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से उसे मनु कहा जाता था. मनु की माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपंत तांबे था. मनु के माता-पिता महाराष्ट्र से झाँसी में आये थे. मनु जब सिर्फ चार वर्ष की थी तभी उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी. मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे. मनु के माँ की मृत्यु के बाद घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नही था इसलिये मनु के पिता उसे अपने साथ पेशवा के दरबार में ले गये, जहा चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था. मनु ने बचपन में ही अपनी प्राथमिक शिक्षा घर से ही पूरी की थी और साथ ही मनु ने बचपन में शस्त्रों की शिक्षा भी ग्रहण की थी.

मई 1842 में 8 वर्ष की उम्र में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वह झाँसी की रानी बनी. विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया.1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया था लेकिन चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी. बाद में महाराजा ने एक पुत्र को दत्तक ले लिया, जो गंगाधर राव के ही भाई का बेटा था, बाद में उस दत्तक लिए हुए बेटे का नाम बदलकर महाराजा की मृत्यु से पहले दामोदर राव रखा गया था. लेकीन ब्रिटिश राज को यह मंजूर नही था इसलिए उन्होंने दामोदर के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया, उस मुक़दमे में दोनों ही तरफ से बहोत बहस हुई लेकिन बाद में इसे ख़ारिज कर दिया गया. कंपनी शासन उनका राज्य हड़प लेना चाहता था. रानी लक्ष्मीबाई ने जितने दिन भी शासनसूत्र संभाला वो अत्याधिक सुझबुझ के साथ प्रजा के लिए कल्याण कार्य करती रही. इसलिए वो अपनी प्रजा की स्नेहभाजन बन गई थी. तत्पश्चात ब्रिटिश अधिकारियो ने राज्य का खजाना जब्त कर लिया और उनके पति के क़र्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का फरमान जारी कर दिया गया. इसके परिणामस्वरूप रानी को झाँसी का किला छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा. मार्च 1854 को रानी लक्ष्मीबाई को किले को छोड़ते समय 60000 रुपये और सालाना 5000 रुपये दिए जाने का आदेश दिया. लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नही हरी और उन्होंने हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया. ब्रिटिश अधिकारी अधिकतर उन्हें झाँसी की रानी कहकर ही बुलाते थे.

घुड़सवारी करने में रानी लक्ष्मीबाई बचपन से ही निपुण थी. उनके पास बहोत से जाबाज़ घोड़े भी थे जिनमे उनके पसंदीदा सारंगी, पवन और बादल भी शामिल है. जिसमे परम्पराओ और इतिहास के अनुसार 1858 के समय किले से भागते समय बादल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बाद में रानी महल, जिसमे रानी लक्ष्मीबाई रहती थी वह एक म्यूजियम में बदल गया था. जिसमे 9 से 12 वी शताब्दी की पुरानी पुरातात्विक चीजो का समावेश किया गया है.

उनकी जीवनी के अनुसार ऐसा दावा किया गया था की दामोदर राव उनकी सेना में ही एक था, और उसीने ग्वालियर का युद्ध लड़ा था, ग्वालियर के युद्ध में वह अपने सभी सैनिको के साथ वीरता से लड़ा था. जिसमेतात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओ ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिको की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्ज़ा कर लिया. 17 जुन 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति प्राप्त की.

भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झाँसी की रानी एक आदर्श वीरांगना थी. सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नही घबराता. उसका लक्ष्य हमेशा उदार और उच्च होता है. वह सदैव आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ट होता है. और ऐसी ही वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी.

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